’’मैं हूं मोदी का परिवार’’-भाजपा का भावनात्मक ’’चौका’’/////रक्षा-उत्पादन क्षेत्र को बना रहे हैं आत्मनिर्भर-राजनाथ सिंह //// मोदी ने तेलंगाना में 56 हजार करोड़ रुपये की विकास-परियोजनाओं का शुभारंभ किया/////मेडिकल छात्रों और मेडिकल/गैर मेडिकल सलाहकारों के एक समूह ने राष्ट्रपति सेमुलाकातकी///////विवेक भारद्वाज ने रांची, झारखंड में दूसरे क्षेत्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया//////भाजपा की दूसरी लिस्ट कल आ सकती है//////-संपादकीय--’’कानून’ शब्द पर विधायिका व न्यायपालिका से उम्मीदें हैं/////

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-संपादकीय--कानून पर विश्वास बढ़ा पर मंजिलें अभी बाकी हैं

-संपादकीय--कानून पर विश्वास बढ़ा पर मंजिलें अभी बाकी हैं


किसी भी देश में भ्रष्टाचार तथा अपराध कोई नयी बात नहीं है और विशेषकर भारत में। भ्रष्टाचार तथा अपराध से आज सारी दुनिया त्रस्त है जिनमें भारत भी है। आजादी के बाद से करीब सात दशक तक हिंदुस्तान में यह बात अपराधियों, भ्रष्टाचारियों तथा गलत और शार्ट तरीके से धन कमाने
की जो प्रतिस्पर्धा चली थी उसका ही परिणाम रहा कि भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिज्ञों के बीच इस विधा के लोग राजनीति के माध्यम से प्रवेश कर गए। परिणाम यह निकला कि भारतीय राजनीति लगातार प्रदूषित होती गई एवं अपराधियों का गढ़ बनती चली गई। अपराध तथा भ्रष्टाचार के माध्यम से जो लोग संपन्न तथा प्रभावशाली होते गए उनके रास्ते पर छुटभैय्या अपराधी और लोग भी बढ़ते चले गए। इन तत्वों ने समझ लिया कि भ्रष्टाचार तथा अपराध के माध्यम से सत्ता, संगठन, व्यापार और व्यवसाय पर कब्जा कर संपन्नता हासिल की जा सकती है। राजनीतिज्ञों की घोषित संपत्ति राजनीति में आने के बाद से लगातार बढ़ती रही। परिणाम यह निकला कि एक तरफ अपराध व भ्रष्टाचार पनपता रहा तो दूसरी ओर इस क्षेत्र को संपन्नता तथा प्रभाव का माध्यम मान लिया गया। इसके परिणाम स्वरूप जातिवाद, संप्रदायवाद और भाई-भतीजावाद भी पनपता रहा तथा देश गरीबी की ओर ही बढ़ता रहा। इसके परिणाम स्वरूप भारतीय न्यायपालिका तथा कार्यपालिका पर भी समय-समय पर आरोप लगते रहे।

लेकिन कहते हैं कि वक्त बदलता है और कोई न कोई मसीहा बनकर पैदा होता है जो कि राजनीति को स्वच्छ करने का प्रयास करता है। देश में कई ऐसे महात्मा और राजनेता कालंतर में पैदा हुए जिन्होंने राजनीति को स्वच्छ करने का प्रयास किया लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। लेकिन हम पिछले पांच साल के दरमियान देख रहे हैं कि गलत तरीके से धन संपदा और कारोबार करने वालों पर नकेल कसी जा रही है। बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ सलाखों के पीछे जा रहे हैं। चारा घोटाला से लेकर शराब के माध्यम से सरकार को हानि पहुंचाने वाले जेल पहुंच रहे हैं। गलत तरीके से संपत्ति अर्जित करने वालों के मकान, दुकान और इमारतों को ध्वस्त किया जा रहा है तो आशा की एक किरण अपराधियों के नेस्तनाबूद होने की तरफ भी बढ़ गई है। इन बीते पांच सालों में हमने उत्तरप्रदेश से लेकर मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में देखा कि गलत तरीके से धन कमाने वाले अब जेल की रोटियां खा रहे हैं या कानून की गिरफ्त में हैं। दुराचारियों तथा अपराधियों के ठिकानों पर सरकार कार्रवाई कर रही है तो इससे अपराधी तत्व सबक ले रहे हैं तो वहीं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पदचिन्हों पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी चल पड़े हैं। अदालतें भी अब बैखोफ होकर तथा बिना दबाव के अपने निर्णय देने लगी हैं। इतना ही नहीं भारत की हो रही प्रगति के कारण भी लोकतंत्र में लोगों का विश्वास कायम हो रहा है।

इस संपादकीय के माध्यम से हम यह कहना चाहते हैं कि अपराध, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद तथा शार्ट तरीके से धन एवं प्रभाव कमाने वालों की संख्या में निश्चित रूप से कमी आई है लेकिन अपराध तथा भ्रष्टाचार पूरी तरह से समाप्त हो गया गया है या हो रहा है तो ऐसा कहना अतिश्योक्ति होगी। ऐसा अभी नहीं हुआ है। अभी भी सरकारी तंत्र में कई विभाग ऐसे हैं जो भ्रष्टाचार के अड्डे हैं। आज भी सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार है और उसकी जड़े काफी गहरी हैं जिन्हें खत्म करने या खोदने में लम्बा वाक्त लगेगा। सड़कों और फुटपाथों पर लगने वाले छोटे कारोबारियों के माध्यम से आज भी इस देश में करोड़ों रूपये का भ्रष्टाचार प्रतिदिन का होता है। चाहे उसे सुविधा शुल्क कहा जाए या फिर अपना काम करवाने के शार्ट तरीेके से विभूषित किया जाए।

भारत के राज्यों में उम्मीद की किरण की शुरूआत हुई है जिसमें गरीबी भी खत्म हो तथा सभी लोग अपनी मेहनत और योग्यता के साथ आगे बढ़ते हुए संपन्न हो। हम उम्मीद करते हैं कि आने वाले वर्षों में देश में भ्रष्टाचार पूरी तरह से खत्म हो जाए। पुलिस, न्यायपालिका, स्वायतशासी संस्थाओं, निर्माण कार्यों से जुड़े कारोबारी, पर्यावरण एवं प्रदूषण से जुड़ी संस्थाएं जहां पर प्रतिदिन की दिनचर्या में भ्रष्टाचार को देखा जा सकता है वो पूरी तरह से खत्म हो जाएं। कहते हैं कि उम्मीद रखनी चाहिए और देश का अधिकांश वर्ग इस उम्मीद को मजबूत होते अवश्य देख रहा है लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ होना बाकी है।
(updated on 29th january 24)