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 -क्यों फैलाया जा रहा है सड़कों का जाल
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लेखक : -शेखर कपूर
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 -राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेस-वे किस वर्ग की जरूरत हैं?

आज देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के अलावा एक्सप्रेस-वे मार्गों के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। कारण यही बताया जाता हैै कि अंतर-प्रांतीय मार्ग और जनपदीय मार्ग अब अतिक्रमण से भर उठे हैं और उनकी सीमाओं का विवाद हमेशा बना रहता है। अतिक्रमण के मसले पर सरकारें और प्रशासन असफल साबित हुए हंै तो दूसरी ओर वाहनों की संख्या बढ़ाने का क्रम लगातार जारी है। अब सड़कों पर दो और तीन लाख की नहीं बल्कि 50 लाख से लेकर करोड़ों रूपये तक के आधुनिक चार पहिया वाहन दौड़ रहे हैं। महंगे वाहनों के लिए सड़कें नहीं हैं और राज्य सरकारें एक्सप्रेस-वे और नये पहुंच मार्ग बनाकर वाहनों की गति को और अधिक बढ़ावा दे रही हंै। आखिर बात विशाल योजना के नाम पर विशाल भ्रष्टाचार की भी तो है जिसमें अरबों रूपये की योजनाएं मा़त्र आज चार पहिया वाहनों के लिए ही तैयार हो रही हैं। आखिर यह कौनसा खेल चल रहा है?

देश में सबसे पहले राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हुआ जिससे कि सड़क आवागमन और माल ढुलाई के लिए सहूलियत हो सके। यहां तक तो ठीक था कि एक राज्य से दूसरे राज्य तक जाने के लिए बेहतर सड़कें चाहिएं और इस दिशा में विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से काम हुआ लेकिन उसके बाद सड़कों के नाम पर जिस तरह से किसानों की भूमि का अधिग्रहण आरंभ हुआ है उसको लेकर कभी भी देश के बौद्धिक जगत और सर्वहारा वर्ग ने चिंता जाहिर नहीं की। हाल ही में हजारों करोड़ रूपये लागत से 176 किलोमीटर का यमुना एक्सप्रेस-वे मार्ग तैयार कर राष्ट्र को समर्पित कर दिया गया और पांच दिनों की मुफ्त के लालीपाॅप के बाद इस मार्ग पर से गुजरने वाले चार पहिया वाहनों को एक तरफ का फैरा किराया रूपये 320 देना पड़ रहा है। आखिर इस मार्ग पर कौनसे और किस तरह के वाहन गुजर रहे हैं तो हम पाते हैं इस सड़क पर सिर्फ वो ही वाहन ज्यादातर गुजर रहे हैं जो आधुनिक हैं, जिनकी स्पीड तेज है और ऐसे वाहनों के चालक, मालिक और विशिष्ट वर्ग इस मार्ग के बहाने अपने आधुनिक वाहन का सही उपयोग भी कर रहा है।

हम अपने पाठकों को यह भी बताना चाहेंगे कि इस वक्त देश में जो महंगाई बढ़ रही है उसकी जद में ये वाहन और इस तरह के मार्ग भी अपना योगदान दे रहे हैं। उदाहरण के लिए भारत सरकार की उदार आर्थिक और पूंजी निवेश नीतियों का परिणाम यह निकला है कि देश में कई यूरोपियन वाहन निर्माता कंपनियां प्रवेश कर गई हैं। ये कंपनियां धड़धड़ाते हुए चार पहिया वाहनों का निर्माण कर रही हैं। उनके पास खरीददार भी हैं लेकिन अधिकांश खरीददारों की मुख्य समस्या यह है कि वो वाहन तो खरीद लेते हैं लेकिन इन आधुनिक वाहनों को चलाने के लिए भारत में सड़कें ही नहीं हैं। जो हैं उनका रखरखाव केंद्र और राज्यों के बीच हमेशा विवाद का विषय बना रहता है। इन वाहन निर्माता कंपनियों और पूंजी निवेश ने ही आधुनिक मार्गों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव डालकर एक्सप्रेस-वे जैसे मार्गों की शुरूआत करवाई है। आखिर दो घंटे में एक वाहन नोएडा से लेकर आगरा तक ले जाने का औचित्य किसका हित सबसे ज्यादा कर रहा है? आम जनता का हित तो इसमें कहीं से है ही नहीं लेकिन अगर अहित हो रहा है तो किसानों का और आम जनता का। क्योंकि राजमार्गों और एक्सप्रेस-वे के नाम पर भूमि का अधिग्रहण होते ही तात्कालिक रूप से किसान को एक बड़ी धनराशि मुआवजे के तौर पर निश्चित रूप से मिलती है लेकिन वह अपनी इसी धनराशि को अय्याशी, आधुनिक सुख-सुविधाओं पर ही ज्यादातर व्यय कर रहा है। उसे खेती के अलावा किसी अन्य कार्य का अनुभव बहुत कम है लेकिन वह अपनी मुआवजा राशि को आधुनिक कारखानों और अनुभवहीन कामकाज में लगा रहा है जहां से उसे निराशा ही हाथ लगेगी। याने कि कुछ साल बाद गरीबी फिर से किसान के दरवाजे पर खड़ी होगी। इसी प्रकार वाहनों को जब सड़कें और अधिक मिल जाएंगी तो पेट्रोल की खपत में तेजी तो आना ही है और इसका फायदा पेट्रोलियम कंपनियों को होना है जो आज देश में अपने तरीके से पेट्रोलियम पदार्थ के दाम बढ़ाये जा रही हैं और देश के आम वर्ग पर उस महंगाई का असर पड़ रहा है। इसके अलावा टायर निर्माण, बीमा कंपनियां, वाहन दुरूस्त करने वाली कंपनियांें की भी पौ-बारह इन मार्गों पर हो रही है क्योंकि उनके पास करोड़ों रूपये आ रहे हैं। इसी प्रकार केंद्र सरकार से राज्यों के विकास के नाम पर जो धन आवंटित होता है राज्य सरकारें उनका उपयोग शिक्षा, साक्षरता, गरीबों के लिए मकान, पेयजल सुविधा और अन्य जरूरतों पर ना कर इन निर्माण कार्यों पर कर रही है क्योंकि इस तरह के हजारों करोड़ के निर्माण कार्य रोके नहीं जा सकते हैं और पूरे करने ही पड़ते हैं और कितना घपला इन कार्यों में होता है उसकी जांच के लिए भी जांच कालंतर में होती रही है। इसी प्रकार मोटर व्हीकल एक्ट में भी दुर्घटनाओं को कभी संजीदा नहीं किया गया। अगर किसी के पास लाइसेंस है और वह जानबूझकर भी दुर्घटनाकर एक या दो या 10 लोग को मार डालता है तब भी उसे तुरंत थाने और अदालत से जमानत मिल जानी है।
हमने इस विषय को इसलिए उठाया है कि देश के सर्वहारा वर्ग के लोग आधुनिक वाहनों की बढ़ती संख्या, राजमार्गों का रखरखान ना करने, मोटर व्हीकल एक्ट को कड़ा ना करने और पहले ही से मौजूद राष्ट्रीय और राजमार्गों के आसपास के अतिक्रमण को ना हटवाने की वास्तविकता को समझें। आगे उन्हें क्या करना है यह उन पर ही निर्भर है।



-अपडेटेड 17 अगस्त 2012,नई दिल्ली।
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