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 भाजपा-कांग्रेस को संसद न चलने देने में दिखता है फायदा
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लेखक : राकेश आर्य
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 भ्रष्टाचार के मुद्दे से संसद भटकी रहे यह भाजपा और कांग्रेस दोनों को भा रहा है.


यही वजह है कि सोमवार को हो रही सर्वदलीय बैठक में भी संसद के चलने को लेकर कोई फार्मूला बनता नजर नहीं आ रहा. खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर चल रहा गतिरोध दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए आसान रास्ता है ताकि कई बड़े मुद्दे इस गुबार में दब जाएं. सूत्र बताते है कि संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दोनों बड़े दलों को यह हंगामें की स्थिति ठीक लगती है क्योंकि संसद सामान्य तौर पर चलेगी तो भाजपा नितिन गडकरी के पूर्ति मामले और कांग्रेस रार्बट वढ़रा के मामले में जवाब देने की स्थिति में नहीं होगी. इसलिए भ्रष्टाचार की बजाय एफडीआई दोनों दलों को ठीक मुद्दा लगता है.


भाजपा शुरू से 184 के तहत चर्चा कराए जाने पर अड़ी है जबकि सरकार झुकने को तैयार नहीं है. वाम दल भी मतविभाजन के तहत चर्चा करना चाहते हैं. भाजपा की सोमवार को संसदीय बोर्ड और मंगलवार को संसदीय दल की बैठक में इस पर गहन चिंतन होना है. सरकार की ओर से भी दिखावटी तैयारी हो रही है कि सर्वदलीय बैठक कर यह संदेश दिया जा सके कि ईमानदारी से प्रयास हो रहे हैं. लेकिन भाजपा और कांग्रेस को यह स्थिति भाती है कि संसद मूल मुद्दों से भटकी रहे है और दोनों बड़े दल जनता की नजर में लड़ते भी दिखे.

संसद का पिछला सत्र कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले को लेकर हंगामे की भेंट चढ़ा था. भाजपा ने सदन चलने नहीं दिया और यूपीए सरकार की ओर से भी कोई कोशिश नहीं हुई. अब कोयला घोटाले की नहीं, एफडीआई की चर्चा है. खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर भाजपा सहित विपक्षी आक्रामक है लेकिन एक मंच पर नहीं है. सरकार से विरोध है लेकिन सब आपस में अपने-अपने मंच पर हैं. तृणमूल कांग्रेस मैदान में अविश्वास प्रस्ताव के साथ आई पर कोई दल उसके साथ खड़ा नहीं हुआ. अब भाजपा मैदान में है और इस बात के लिए अड़ी है कि 184 में चर्चा हो. पर सवाल है कि भाजपा कांग्रेस को घेरना चाहती है या फिर सिर्फ संसद का गतिरोध बरकरार रखना चाहती है. जाहिर है कि भाजपा इस चर्चा के माध्यम से सिर्फ कांग्रेस का फ्लोर मैनजमेंट बिगाड़ना चाहती है.

कोयला ब्लॉक आवंटन पर सरकार ने ऐसे ही पूरी भाजपा की आक्रामक आंधी को निकाल दिया और कुछ नहीं हुआ. प्रधानमंत्री ने न तो इस्तीफा दिया और न कोई सवाल हल हुआ. अब भी कांग्रेस और केंद्र सरकार का वही पुराना तेवर है कि भाजपा को हल्ला करने दो. इस बार भी संसद में ऐसे ही हो हल्ला होगा और सरकारी कामकाज चुपचाप हो जाएंगे. मसलन इसी गतिरोध में लोकपाल की प्रवर समिति ने राज्य सभा में अपनी रिपोर्ट रख दी.

सरकार की ओर से साफ है विपक्ष की मांग को स्वीकार नहीं करेगी क्योंकि मतदान की स्थिति में किसी संभावित खतरे को उठाना नहीं चाहती. कांग्रेस की तरफ से अपने सहयोगी दलों को मनाने की पूरी कोशिश है लेकिन सबको पता है कि वह ऐसा मौका नहीं आने देना चाहती, जिसमें चाबी दूसरे लोगों के हाथ में आ जाए. द्रमुक और सपा जरूर यह भरोसा दे रहे हैं कि साथ देंगे लेकिन अंतिम समय में क्या करेंगे, इसको लेकर सरकार कोई जोखिम नहीं लेगी. द्रमुक पहले से नाराज है. द्रमुक और सपा दोनों एफडीआई के विरोध में सड़क पर उतर चुके हैं. बसपा ने भी अभी संसद में अपनी रणनीति जाहिर करने को कहा है. सरकार की ओर से कोई ऐसी ठोस कोशिश होती नहीं दिख रही जिससे कि यह कहा जाए कि सदन चलेगा.
(sources- sahara samay)

(updated on 25th November 2012 at 2030 hrs)
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