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 देशी उद्योगों से ही खुशहाली होगी

प्रधानमंत्री को खुला पत्र
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लेखक : ओमप्रकाश रहेजा
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श्री ओमप्रकाश रहेजा उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद शहर के एक उद्योगपति होने के साथ ही आर्थिक विषयों पर समय-समय पर लिखते रहे हैं और अपने विचारों से भारत सरकार, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को देश और प्रदेशों की आर्थिक नीतियों से अवगत कराते रहे हैं। इस लेख में भी उन्होंने देश में हो रहे पूंजी निवेश और भारतीय उद्योग जगत पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कुछ सुझाव दिये हैं-संपादक।
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केंद्रीय सरकार कह रही है कि राष्ट्र की आर्थिक स्थिति 1991 जैसी बन गई है और इसको संभालने का एक ही तरीका है विदेशी पूंजी का निवेश। मेरी नजरों में विदेशी निवेश, विदेशी-राज से भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि विदेशी राज से जब भारत आजाद हुआ तो हमें सारे भारत की आर्थिक सम्पदायें मिल गईं और अब विदेशी निवेश से आजादी पाने के लिए हमें डालर में भुगतान करना पड़ेगा और डालर में भुगतान कौन करेगा और कहां से करेगा, यह मेरी समझ से बाहर है।

केंद्रीय सरकार ने 1991 में आर्थिक दशा को सुधारने के लिए ऐसे कानून बनाये जिनसे विदेशी निवेश व आर्थिक सुधारों के नाम पर भारतीय उद्योगपतियां की सैकड़ों कपंनियों को विदेशी लूटकर ले गए। अमीर देशों ने विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) सिर्फ गरीब देशों के उद्योगों व व्यापारी संस्ािानों को लूटने के लिए बनाया गया है। जैसे ही उससे उन्हें नुकसान हाने का अंदेशा होगा उसको भंग कर दंेंगे।

वर्ष 1991 से भारत सरकार को जाने अथवा अनजाने में सरकार चलाने का तरीका मिल गया कि राष्ट्र और राष्ट्रवासियों के निजी उद्योगों व व्यापारिक संस्थानों को विदेशियों को बेच दो और देशवासियों व दुनिया का दिखा दो कि हम तरक्की कर रहे हैं जबकि हम देश को गुलाम बना रहे हैं। और इनाम स्वरूप सरकार व सरकारी कर्मचारियों का वेतन, महंगाई भत्ता, व दूसरे लाभ भारी मात्रा में बढ़ाए जा रहे हैं।

मैं लिख रहा हूं जाने या अनजाने में क्योंकि वर्ष 2008 में भी 1991 वाली स्थिति सरकार ने बना दी थी लेकिन मैंने 10 अक्टूबर 2008 के एक पत्र द्वारा देश को बचाने के लिए कुछ सुधारों की मांग की थी। इसके बाद औद्योगिक संगठनांे ने सरकार पर दबाव डाला तो दिसम्बर 2008 में उद्योगपतियों से प्रधानमंत्री की मुलाकात पर 5 प्रतिशत का आयात कर लगाया गया और 5 प्रतिशत भारतीय उद्योगों पर कर कम किया गया जिससे जनवरी वर्ष 2009 में ही 32 प्रतिशत आयात कम हो गया जिससे हम मंदी व रूपये के अवमूलयन से देश को उबार पाये और हमें विदेशी पूंजी निवेश की जरूरत नहीं पड़ी।

अब फिर भारत सरकार ने भारतीय उद्योगों पर टैक्स बढ़ाकर और आयात कर हटाकर जाने या अनजाने में फिर 1991 वाली आर्थिक स्थिति पैदा कर दी है। यह गलत कदम सरकार अब वापस लेने के लिए मना कर रही और आसान तरीका अपना रही है कि देश को बेचो और राज करो।

अब मैं केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर व सभी राजनीतिक पार्टियों व उद्योग जगत से प्रार्थना करता हॅू कि गलत नीतियों को बदला जाए और देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए तत्काल कदम उठायें जिनमें से कुछ सुझाव इस प्रकार हैंः-
मेरा साफ कहना है कि गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, विदेशी व्यापार असंतुलन व रूपये के अवमूल्यन की दिशा में (1)तात्कालिक रूप से 5 प्रतिशत आयात कर लगाया जए और 5 प्रतिशत उत्पादन कर व 3 प्रतिशत सेवा कर कम किया जाए। भारतीय उत्पाद पर सब कर मिलाकर जितना कर लिया जाता हे उससे आयात कर कम ना हो और अगर सरकार ने किसी देश से बिना आयात-निर्यात कर का समझौता कर रखा तो आयात कर के बदले में स्थानीय कर लगाकर भारतीय उद्योगों को बचाया जाए। हम समझौतों से आयात कर समाप्त कर रहे हैं और बजट की भरपाई करने के लिए भारतीय उद्योगों पर कर बढ़ाते जा रहे हैं। अगर ऐसा किया जाता है तो इससे कम से कम 35 प्रतिशत आयात कम होगा हौर भारत में उत्पादन बढ़ेगा। इसी प्रकार देश में मंदी दूर हो जाएगी और रोजगार के अवसर बढ़ जाएंगे। इतना ही नहीं भारतीय रूपया मजबूत होगा और इससे महंगाई कम होगी और देश आर्थिक गुलामी से बच जाएगा। इसी प्रकार (2)दूसरा उपाय यह है कि विलसिता की वस्तुओं का आयात बंद हो क्योेंकि इन्हीं के आयात करने के लिए हमें विदेशी पंूजी की जरूरत है जिसके लिए हम उद्य़ोग व फुटकर व्यापार बेच रहे हैं। अगर इस दिशा में कदम उठाए जाते हैं तो इससे आयात-निर्यात
संतुलन ठीक हो जाएगा, इससे रूपये का अवमूल्यन ठीक हो जाएगा, विदेशों से कर्ज नहीं लेना पड़ेगा, इससे हमें विदेशी निवेश की जरूरत नहीं रह जाएगी, इससे महंगाई कम हो जाएगी और देश आर्थिक गुलामी से बच जायेगा।

मेरा सुझाव है कि भारतीयों का विदेशों में निवेश बंद किया जाए जो निवेश किया गया है उसे वापिस मंगाया जाए। इसी प्रकार विदेशियों को फुटकर व्यापार में इजाजत नहीं हो तथा इंश्योरेंस बैंकिंग आदि में हिस्सेदारी ना बढ़ाई जाये और जो भी उद्योग भारतीय उद्योगपति बना सकते हैं उनमें विदेशी निवेश बंद हो। मेरा यह भी कहना है कि माल का निर्माण बंद हो जब तक खाद्य गोदाम नही बन जाते और खाद्य गोदाम सिर्फ सरकार या भारतीय उद्योगपतियों द्वारा ही बनाये जाएं। इसी क्रम में सुझाव यह भी है कि उद्योगों का ब्याज तात्कालिक 3 प्रतिशत कम हो और उद्योगों पर ब्याज होम लोन तथा कार लोन से कम होना चाहिए।

उपरोक्त बातें और सुझाव संक्षिप्त क्रम में हैं और आने वाले समय में मैं इस विषय को और अधिक विस्तारित करने की कोशिश करूंगा लेकिन इतना अवश्य कहना चाहता है कि अगर केंद्र सरकार इस तरह के कदम उठाती है तो रूपये का मूल्य 55 रूपये प्रति डालर से घटकर 36 रूपये प्रति डालर हो जाएगा जो कि जनवरी 2008 में था। इसी प्रकार इससे 35 प्रतिशत आयात कम हो जाएगा और विदेशी व्यापार संतुलन ठीक हो जाएगा। गरीबी समाप्त होगी और बेरोजगारी कम होगी तथा हमें विदेशी पूंजी निवेश् की जरूरत नहीं पड़ेगी।


My Email Id: rahejaomprakash@gmail.com

(updated on 1st December 2012)
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