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21वीं शताब्दी शुरु हुए आज 18 वर्ष बीत चुके हैं। इस शताब्दी ने 20वीं शताब्दी में आए हुए परिवर्तनों को बहुत तेजी से आगे बढ़ाया और इसक साथ कई अन्य परिवर्तन भी आए। युग बदले, समय बदला, परिस्थितियां बदली, आवश्यकताएं बदलीं और इन सबको समेटने की धुन में मनुष्य भी बदल गया, उसके मल्य भी बदल गए, उसके सिद्धांत बदल गए, नजरिया बदला, सोच बदल गई, समझ बदल गई - कुल मिलाकर जीवन जीने का ढंग बदल गया।

बदलाव अच्छा भी होता है और एक शाश्वत , अटल सच भी है परंतु हमारी संस्कृति और सभ्यता विश्व में सबसे पुरानी है। समय के हर दौर को, हर संघर्ष को जीतकर अपने मूल्यों के दम पर हमने विष्व में अपने आप को स्थापित और सजीव रखा है।
मोहनदास कर्मचंद गांधी - जो अहिंसा के पुरोधा हैं व लाल बहादुर शास्त्री जो मानवीय मूल्यों के पुरोधा है उनकी जयंती के अवसर पर आवश्यकता है कि हम चिंतन करें कि क्या हम आज भी उन मूल्यों पर चल रहे हैं जिन पर हमारे पूर्वजों ने चलकर विश्व में अपना स्थान पाया है ?


विद्यालय ही एकमात्र वह उचित जगह है जहां हम अपने देश के भावी नेताओं की नींव को मजबूत कर सकते हैं चाहे वह पढ़ाई का क्षेत्र हो या नैतिकता का । आज के इस भौतिकवादी युग में संघर्ष, लड़ाई, वैमनस्य, द्धेष, भेदभाव आदि नकारात्मकता का बोलबाला है परंतु यदि ध्यान से सोचें तो हम कह सकते हैं कि जीवन इस नकारात्मकता के बिना ज्यादा अच्छा व सुचारु चल सकता है । मेरी नजर में संघर्ष दो प्रकार के होते हैं सकारात्मक व नकारात्मक ।


सकारात्मक संघर्ष अर्थात उन्नति करने के लिए विपरीत व प्रतिकूल परिस्थितियों पर अपनी समझ बूझ से, बिना किसी को नुकसान पहुंचाए प्रगति के रास्ते ढूंढना और उन पर चलकर उन्नति प्राप्त करना ।


नकारात्मक संघर्ष अर्थात रंग, धर्म, जाति, संप्रदाय, राज्य आदि के नाम पर एक दूसरे को नीचा दिखाना और अपने आप को सबसे बेहतर और ऊंचा न केवल समझना बल्कि साबित करने के लिए दूसरों को पूरी तरह से खत्म करने के प्रयास करना ।
सकारात्मक संघर्ष हमें मजबूत बनाता है, हमें जीवन की राह दिखाता है, हमें स्थापित करता है, इतिहास में हमें सम्मानजनक स्थिति में खड़ा करता है हमें, हमारे समाज को, हमारे देश को और विश्व को आगे बढ़ाता है, हमारा आत्म विश्वास बढ़ाता है, हमें नये अनुभव देता है, सभ्यता का विकास करता है ।


दूसरी ओर नकारात्मक संघर्ष केवल बर्बाद ही करता है - घरों को, समाज को, देश को, विश्व को । यह हमें व हमारी सभ्यता को कई साल पीछे धकेल देता है - सामाजिक तौर पर भी और आर्थिक तौर पर भी । यह संघर्ष एक ऐसी जीत देता है जिसका जश्न केवल मुटठी भर लोग ही मना पाते हैं परंतु बहुत बड़ी कीमत देकर । समय की आवश्यकता है कि शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले आगे आए और अपने शिष्यों को समझाएं कि किस प्रकार का संघर्ष उनके लिए उचित व लाभकारी है। केवल विन्रमता, शांति और सहयोग हमें ऊपर उठा सकते हैं, हमारा विकास कर सकते है और हमें हर क्षेत्र में आगे बढा सकते हैं।


विद्यालयों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। शिक्षाविदों को समझने की आवश्यकता है कि आज के परिपेक्ष्य में जब हम अपने विद्याथियों के सर्वांगीण विकास की बात करते हैं तो यह विकास तीन बिंदुओं पर आधारित होना चाहिए विद्या का विकास, बौद्धिक विकास व आध्यात्मिक विकास । जब हमारी भावी पीढ़ी का विकास इन तीन बिंदुओं पर आधारित होगा तो उन्हें संघर्ष के दोनों रूपों-सकारात्मक व नकारात्मक का पूर्ण ज्ञान होगा। वे निश्चित कर पाएंगे कि उनकी स्वयं की व समाज की उन्नति के लिए क्या आवश्यक है और वे उसी दिशा में आगे बढ़ कर अपने देश व संपूर्ण विश्व की दिशा और दिशा को बदलने में सफल होंगे।


यदि हम एक उज्जवल, उत्तिष्ठ, उत्कृष्ट भारत वर्ष का सपना देखते हैं तो आवश्यक है कि हम अपने उत्राधिकारियों को आधुनिकता के साथ-साथ मूल्य संपन्न ज्ञान भी दें ताकि वे अपने साथ अपने समाज, अपने देश, अपने विश्व को प्रगति के पथ पर अग्रसर करें।
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WRITER'S DETAILS

सुश्री अमिषा साहनी
मुख्याध्यापिका
पं. मोहन लाल ग्लोबल स्कूल
जी. जी. एस. डी. कालेज सैक्टर 32-सी द्वारा संचालित)
बटाला रोड़, फतेहगढ़ चूड़िया (जिला गुरदासपुर) पंजाब


(Matter reproduce)
(UPDATED ON OCTOBER 1ST, 2019)

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