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शिक्षा से देश की गरीबी मिटाई जा सकती है


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15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से देश आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ। इसके बाद देश ने संविधान के तहत विकास की जो डोर थामी वह फिर नहीं टूटी। देश लगातार विकास करता रहा लेकिन इसके बावजूद देश के संविधान की रक्षा, देश की सीमाओं की सुरक्षा, आंतरिक शांति, सामुदायिक सद्भाव, गरीबी, रोजगार जैसे विषय लगातार प्रश्न के रूप में देश के सामने आज भी हैं। इन्हीं विषयों को प्रस्तुत है रतलाम संसदीय क्षेत्र के भाजपा सांसद गुमान सिंह दामोर के विचार। श्री दामोर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहने के साथ ही सरकारी महकमे में अधिकारी भी रह चुके हैं-

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भारत को एक संशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित करना हर देशवासी का कत्र्तव्य है। किसी भी देश के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है। जब राष्ट्र विकसित होता है तो वहां की आबादी भी विकसित मानी जाती है। विकसित राष्ट्र की परिभाषा यही है कि हम अपने संविधान के तहत प्राप्त अधिकारों को तो समझें लेकिन उसका गलत अर्थ कतई न निकालें। हमें जो अधिकार आज हमारे देश में लोकतंत्र के तहत प्राप्त हैं अगर उसकी बुनियाद अर्थात इतिहास में जाकर देखा जाए तो 1947 के पहले हम सभी दीन और द्ररिद्रता के दायरे में ही थे। देश ने जो भी विकास किया उसका मुख्य कारण शिक्षा ही रहा। आज देश जिस मुहाने पर खड़ा है उसमें शिक्षा की जबर्दस्त योगदान रहा है। शिक्षा वह हथियार है जिसके माध्यम से स्वयं, पड़ोसी, परिवार, समाज और देश की गरीबी मिटाई जा सकती है। हमें आने वाले समय में और अधिक समग्रता के साथ इस दिशा में कदम उठाने होंगे।

इस देश में विभिन्न जातियों और धर्म के लोग रहते हैं। सभी मिलजुलकर रहें और वैमनस्यता को अपने पास फटकने भी न दें। भाईचारा इस देश की आजादी के गर्भ में रहा है और हम सभी को इस सच्चाई को ध्यान में रखना होगा। कोई भी व्यक्ति अपने परिवार के साथ घर के अंदर अपना धर्म निभाएं लेकिन घर के बाहर आते ही राष्ट्र धर्म को सर्वोच्च प्राथमिकता दे तो हमारा लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा। ज्ञान का भंडार हर व्यक्ति और समुदाय के पास है लेकिन उस ज्ञान को सकारात्मक भाव के साथ स्वीकार करना और बांटना भी हम सभी का कत्र्तव्य है। हमारा संविधान शब्दों की परिभाषा है लेकिन इसमें अनुशासन, सौहार्द, भाईचारा, सभी की प्रगति, सभी को समानता और विश्व बंधुत्व की भावना भी निहितार्थ है।

आईये! हम सब मिलकर सिर्फ 26 जनवरी के दिन ही संविधान की रक्षा की सौगंध तो लें लेकिन साथ ही जीवन पर्यन्त उसके आदर्श और नियमों पर भी चलें। हम किसी की अस्वीकार्य बात को भी स्नेह और अपनत्व के साथ ग्रहण करें तथा अनुशासन को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। फिर देखिये हमारा देश और हम विश्व के नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित हो जाएंगे। जयहिन्द!

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